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हे मौसम तू क्यों इठलाता है।

हे मेरे शहर के मौसम, क्यों तू इतना इठलाता है।
इतना बेरहम तो नहीं, तू फिर भी यूँ दर्शाता है।।
मुझे याद है, मैं भूला नहीं,
याद है मुझे मैं भूला नहीं,
कि बरखा यहाँ जब आई थी,
उसने सर्दी-खाँसी दी और तूने त्वचा जलाई थी।
मैं अब भी तुझको देख रहा हूँ,
कि कैसी तेरी खुमारी है,
तेरे इठलाते अंदाज से लगता है,
मेरे शहर कीभभी शिमला बनने की तैयारी है।
जाड़ा देर से आया तो,
फिर क्या तुझे परेशानी है,
इतने कड़काले जाडे़ के ऊपर,
तू लाया शीतल पानी है।
अब ऐसे दिन गये हैं कि,
कंबल में घुसकर भी, पड़ रही आग जलानी है,
फिर भी माँ कहतीं हैं कि,
नहा लो, बिन नहाए नहीं मिलना रोटी पानी है।
अरे ओ बेरहमी हया तो कर,
हम मासूमों पर दया तो कर।
तेरे इठलाने से यूँ लगता है कि,
जाडे़ में फाग,बसकारे में दीवाली मनाना है,
क्योंकि हम मासूमों पर जुलम करने का,
तूने तो पक्का ठाना है।
हमसे दुश्मनी बयाँ करने का,
क्यों तूने यही समय निकाला है,
ऐ मेरे शहर के मौसम,
तू क्यों इतना इठलाना है।
तू क्यों इतना इठलाता है।।।।।
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