ईश्क में लूटते औ" लूटाते हैं,
बहुत पाकर,कुछ नहीं वह पाते हैं।
ईश्क है एक अथाह दरिया,
जिसे तैरकर पारकरना चाहते हैं।
ईश्क का जो पान किया,
वह सर्वस्व अपना दान किया।
ईश्क करना तो मनुज का कर्म है,
फिर क्यों हो रहा ईश्क में अधर्म है।
ईश्क तो खुदा का देन है,
हर कोई इसलिए ईश्क में बैचेन है।
ईश्क है कि किसी को सोने नहीं देता,
ईश्क है कि किसी को खोने नहीं देता!
ईश्क स्वर्ग की वह अनुभूति कराती है,
जिसे इन्सान भूलकर भी नहीं भूला पाती है!
------ संदीप कुमार "संजन"
भगवानपुर,अररिया,बिहार
---------!! धन्यवाद दोस्तों !!------------
©sanjan
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