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ईश्वर कहाँ हैं

सारी मजहबी किताबें इसलिए है क्यूंकि ईश्वर आज तक किसी को नहीं मिला
सारे मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे इसलिए है क्योंकि किसी को अब तक उसका पता नहीं मिला
ये सारी मुर्तियाँ और तस्वीरें इसलिए है क्योंकि किसी को उसका आकार नहीं मिला
या तुम ढूंढना नहीं चाहते ईश्वर को
किसी को ढूंढना भी नहीं है शायद
तभी तो ढोंग करते है ढूंढने का
कभी बेज़ुबान गो माता को पूज लेते है
और वही घर के आँगन मे घुस जाये तो
लकड़ी से मार भी लेते है
तुम कितने अवसरवादी हो
अपनी सुविधानुसार तुम ईश्वर को ढूंढ़ते हो
अगर तुम्हे ये पता चले फला देवता की पूजा शुभ नहीं
तो तुम उसकी पूजा करना छोड़ दो
अगर तुम्हे पता चले यहाँ नहीं मिलेगा मंदिर मे कुछ भी
तुम मंदिर जाना भी छोड़ दो
दिखावे और अपनी झूठी शान के लिए रुपये लुटाते हो
पर एक भिकारी के लिए दो रुपये भी देने मे भी हिचकिचाते हो
बड़े बड़े शोरूम मे जाते हो और मुहमांगी कीमत देकर आते हो
और ठेले वाले से सब्जी लेते वक़्त मोलभाव करते हो
बेगानों से झूठा प्यार जताते हो
और अपनों को बातों बातों मे ताने मारते हो
तुम्हे पता तो है तुम कहते भी हो ईश्वर मन मे है
फिर यहाँ वहां क्यू ढूंढ़ते फिरते हो
क्योंकि तुम्हे दिखावा करना है
कि तुम कितने धार्मिक हो
कि तुम उसके कितने बड़े भक्त हो
ये सारे दिखावे इसलिए है क्योंकि
किसी को आज तक खुद स्वयं नहीं मिला
ये सारी मजहबी किताबें इसलिए है क्योंकि किसी को आज तक ईश्वर नहीं मिला.
©04shivanya