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इंकलाब

अब सत्ता के गलियारों में,इंसाफ के लिए आवाज़ उठेगी।
और किसी कि अब किस्मत,यु लाचार बनकर नहीं फुटेगी।
अब बस हुआ,किसी भी बेटी का शव,अब बेवारस यु नहीं जलेगा।
हमने अपना फर्ज निभाना,इंसान होने का कर्ज चुकाना।
अंधे शहर,अंधी बस्ती में,इंकलाब की अब ज्योत जलेगी।
अब और इक तरफे फैसले नहीं,इंसाफ कि सच्ची बात चलेगी।
वक्त रहते ना संभले तो,न जाने और कितने झुलसेंगे।
रहेगा अब ये दायित्व हमारा,तबाह न होने देंगे देश हमारा।
जिनको तेज़ खबरों कि,बड़ी जल्दी थी,वो भी चुप है,
ऐसा कैसा चौथा स्तंभ हमारा।
अरे उठो कुंभकर्ण से सोने वालों,
हाथों में अब सब मशाल जला लो।
कहां कहां छिपे बैठे हैं गिध्द ढुंढो,सबको अदालत तक पहुंचा दो।
और न्याय को इक तरफा फैसला नहीं,एक सच्चा इंसाफ बना दो।
कवि:-अभय ना. ताकसांडे
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