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"इश्क़ मतलबी"

उन्हें इश्क़ का बरतन झूठा नहीं चाहिए, हो जिस्म साफ जितना, एक भी दाग नहीं चाहिए।
वो कर के हाथ खारे मेरे ज़ख्म मिटाने आए थे,
वो जलाने मेरे ज़िन्दगी के चिराग हवाएं साथ लाए थे।
इश्क़ का नाम लेकर मेरे शहर के रांजे फिर से मेरे जिस्म के पर्दे उतारने आए थे।
वो जो मुझे बंद कमरों में मिले, किसी अंधेरी गली में मेरे जिस्म को चीरने वालें आज बातें राम की करते है।
हर जिस्म को झूठा करने के बाद, ये हमजा सच्चें इश्क़ की तलाश करते हैं।
तेरा इश्क़ मेरे जिस्म के साथ खेलने का मेरी रूह को बिखरा गया, की अब कफ़न भी लपेटा ना जाएगा इस कदर मुझे तोड़ गया, कि तेरे ये दिए हुए निशा अब सिर्फ इस बात का इंतजार करते है कि तुम तो लौट कर आने से रहे और वह इश्क़ का बर्तन सच्चा मांगते है।
©rishab