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इश्क़

दिल भर आता है जब भी ये तक़दीर सोचकर
मैं अक्सर खुद को सम्भाल लेती हूँ!
ज़ख्मों की कोई दवा भी नहीं मिलती जालिम
मैं खुद ही दिल पर मरहम लगा लेती हूँ!
ज़िक्र होता है जब भी बज्म में मोहब्बत का
मैं सब से अपनी नज़रें चुरा लेती हूँ!
पूछता है जब भी कोई इस तब्बसुम का राज़
मै चुपके से अश्कों को पलकों में छुपा लेती हूँ!
चांद भी कम्बख्त बेवफा सा हो गया है आजकल
मैं तेरी तस्वीर को ही चांद बना लेती हूँ!
चाहत तो बहुत है पर तेरे दीदार की अब उम्मीद नही
मैं अपने लफ्जों मे ही तुझे तलाश लेती हूँ!
नाम आता है तेरा जब भी किसी की ज़ुबाँ पर
मैं दर्द छुपाकर हल्के से मुस्कुरा लेती हूँ!
सहर आती है जब भी ज़ुल्मत के बाद
मै फिर से चंद घंटों के लिये गमों को भुला देती हूँ!
©riyajangra