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जिधर देखो मर्ज ' ए ' इश्क़ में बीमार बैठें है...

जिधर देखो मर्ज ' ए ' इश्क़ में बीमार बैठें है
राह ए मोहब्बत में प्रतीक्षा करते
सूनी गलियों में पंथ निहारते
अकेलेपन में रोते - सिसकते
ख्यालों की कतारों में गुमसुम रहते
जिधर देखो गम ए जुदाई में इश्क़ के तलबगार बैठें है
जिधर देखो मर्ज ए इश्क़ में बीमार बैठें है..।
बातों - बातों में अनबन बनते
गुत्थियां उलझती गड़े मुर्दे उखड़ते
एक क्रोध में , दूसरे अबोध जैसे
आरोप - प्रत्यारोप बुनते सुनते
सहसा निपट एकांत से पसरते
खामोशी के कतरे-कतरे उभरते
जिधर देखो नोक झोंक में बोध खोये समझदार बैठे हैं
जिधर देखो मर्ज ए इश्क़ में बीमार बैठे हैं..।
प्रीत करें पर निभाना न सीखी
प्रेम विधा की कसौटी ना परीखी
जाति - पाँति के फंद जाल से
जबकि प्रेम पंछी रहते विमुक्त
प्रेम सरस है , प्रेम समर है
है प्रेम सहज समर्पण - युक्त
जिधर देखो वंश में उलझे इश्क के कसूरवार बैठे हैं
जिधर देखो मर्ज ए इश्क़ में बीमार बैठे है..।
सांची प्रीत तो मिल ही जाती
तोड़ सारे बंधन रूह एक हो जाती
हम - तुम कौन से " हस्ती " हैं
जब संगी विधाता ही रचती है
मानता हूं प्रतीक्षा पीड़ादायी है
पर जानता हूं अमर प्रणय सुखदायी है
जिधर देखो नजर टिकाए इश्क़ पर पहरेदार बैठे हैं
जिधर देखो मर्ज ए इश्क़ में बीमार बैठे है..।
सुन ओ प्रेम - पथिक बंधु मेरे
जीवन में आए जाएंगे बहुतेरे
गर दे रहा दर्जा तुझे ए खुदा का
निभा रहा वफा,है शागिर्द तेरी रजा का
सच में वो फरिश्ता है ,बंदा है खुदा का
तू भी सीख ले कद्र ए हबीबी
दूर हो जाते अक्सर हमारे करीबी
जिधर देखो गुनाह-वफाई में इश्क के गुनाहगार बैठे हैं
जिधर देखो मर्ज ए इश्क में बीमार बैठे हैं..।
©Vijayvirat