एक सुबह उठा, नये सवेरे की खोज में,
हर दिन की तरह चल पड़ा अर्थ की रोज में।
खोजी रहा जगत में, किताबों में, खुद में भी,
जीवन क्या है? पूछा सभी से, सुना कहीं भी।
किसी ने कहा प्यार है जीवन, किसी ने कहा संघर्ष,
कोई बोला खोज है जीवन, कोई बोला उत्सर्ज।
मैं चलता गया, देखता गया, सीखता गया,
जीवन का अर्थ बदलता गया, विस्तारित होता गया।
एक दिन पाया, जीवन का अर्थ एक नहीं, अनेक है,
साँसों की गिनती में नहीं, उन साँसों में जो व्यतीत है।
जीवन वो नहीं जो खोजा जा सके, या समझा जा सके,
जीवन वह है जो जिया जा सके, जो महसूस किया जा सके।
तो अर्थ ढूँढने में न जाओ खो,
जीवन तो है, हर पल में, जिसे तुम सोचो