जिंदगी की राह पर चल पड़ा बेखबर होकर,
कई पत्थर आए बीच मे उससे कदमो को बचाकर,
मौसम लेती कई अंगडाईया जिसे बेखूबी जानकार,
हर अंगडाई को रग रग से जाना गहराई मे जाखकर,
सांसो की गति मे आती उत्तेजना को नियंत्रित रखकर,
दिमागी सोच कार्य की क्षमता को सही से नाप तोल कर,
हर कदम लेता हूँ मंज़िल की और जागृत रहकर,
आना है बुलावे को एक दिन इसे समाजकर,
जी रहा हू ज़िन्दगी एक मुसाफिर की तरह मस्त हो कर,
हर मुकाम पर खुशी को कूबूल के जीने का लुफ्त उठा कर,
सफर को हसीन बनाता हू मौज से हरदम मुस्कुरा कर...
जिंदगी की राह पर चल पड़ा था बेखबर होकर...
आने दो बुलावे को उसे जब भी आना हो; हू बेफिकिर...
©hemantjsha
H