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ज़िन्दगी यूं गुज़र गई

कि दोष तो सब अपना था
तो ज़िन्दगी से क्यों करे गिला
जिनको दिया अपना सारा वक़्त हमने
उनको हमारे लिए कभी वक़्त ना मिला।
कि इन गमों को समेटते-समेटते अपनी जिंदगी
ताश के पत्तों की तरह बिखर गई
कि अपने लिए कभी वक़्त ना मिला
और ज़िन्दगी यूं गुजर गई।

वक्त ने ढाया ऐसा सितम
कि फिर संभल न सके हम
ज़िम्मेदारियों के बोझ तले
ख्वाइशों सब मर गई
ज़िन्दगी यूं ही गुज़र गई ।
©raka