S

जल्दी उठने की आदत डाल लो, अगले घर जाना है, सलीके से खाना बनाना सीखो, वहाँ सबको…

जल्दी उठने की आदत डाल लो, अगले घर जाना है,
सलीके से खाना बनाना सीखो, वहाँ सबको रिझाना है।
लड़कियों की तरह रहना सीखो, यूँ आज़ाद परिंदा न बनो,
कम बात किया करो गैरों से, अपने ही घर में शर्मिंदा न बनो।"
रोज-रोज के इन तानों से अब मेरा दम घुटने लगा है,
अपने ही आँगन में मेरा वजूद, तिनका-तिनका टूटने लगा है।
बाबुल के इस घर में, मैं खुद को बेगाना पाती हूँ,
जब हर बात पर मैं 'पराए घर की अमानत' कहलाते थक जाती हूँ।
मन में एक ही टीस उठती है, एक ही सवाल बार-बार आता है,
क्या विदाई का मतलब सिर्फ एक घर से दूसरे घर जाना है?
मैं वहाँ उस घर की इज़्ज़त, वहाँ की बहू बनकर जा रही हूँ...
या फिर उम्र भर के लिए, एक नौकरानी बनकर जा रही हूँ?
जिन्होंने पाला-पोसा, आज वही मुझे गैरों की तरह आज़माते हैं,
प्यार देने की उम्र में, मुझे हर पल बस 'अगला घर' याद दिलाते हैं।
💞 Sona 💞