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कद़र न की मेरी कभी

एक तुम ही थे, मेरी ज़िन्दगी में
इस अजनबी दुनियां में मेरे अपने।
एक तुम ही थे, जिसे अपना बनाना चाहा,
तुम्हीं से थी सारी उम्मीद और सारे सपने।
पर तुमने कभी मुझे समझा नहीं
कद़र न की मेरी कभी, अब वक़्त निकल गया।
अब तक शायद तुमने देर कर दी,
अब हमें तुम्हारे बिन ही जीना रास आ गया।
©atulverma