ख़फ़ा-ख़फ़ा सी रहती है वो आज-कल,
पूछता हूँ, तो कुछ भी बताती नहीं है!
मैं कहता हूँ, सब छोड़ तू चल मेरे साथ,
मग़र वो एक भी कदम बढ़ाती नहीं है!
जाने क्या बात है, जो मैं नहीं जानता,
जानना चाहता हूँ, पर जताती नहीं है!
कैसे जानूं मैं जान, हाल तेरे दिल का,
कैसे पढूँ, तू आँखे भी मिलाती नहीं है!
मैं तन्हां रातों में बेचैन करवटें लेता हूँ,
क्या तुझको मेरी याद सताती नहीं है!
चाहता हूँ, रुक जाए आज यह लम्हां,
और तू बताए कि मेरी ख़ता कहाँ थी!
यूँ तन्हां तो न कटेगा, ये सफ़र ज़िन्दगी का,
अब साँसें तुझ बिन, दिल धड़काती नहीं है!
✍️ महेश कुमार 'मैडी' ✍️
©mkmaddy
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