जब मैं करने बैठी पढ़ाई
निंद्रा भी अतिथि बन चली आई
अगर उसका करे स्वागत
तो बैस्ट होगी हमारी पढ़ाई
कुछ तो.......
हम थे पहले ही खाली कढ़ाई
कुछ....
दूसरों की सुन सुनकर बढ़ाई
लगता है ऐसे
जैसे हमें तो आती ही नहीं पढ़ाई
इसी बीच स्ट्रेस दिमाग में
पा लेता है स्थान अपना
और हम.....
देखते रह जाते हैं सिर्फ सपना
काहे कि पढ़ाई
रह जाते हैं इसी के बीच
फिर क्या नंबर आते हैं
सिर्फ ३०
तो हमें कहते हैं करने को
दूसरों की रीस
इतना कुछ सुनकर कभी-कभी
हमें लगता है हम तो
छोटे ही थे ठीक
क्योंकि हमें जब कोई नहीं कहता था
किसी की......
करने को रीस
फिलाहल तो हम रह रहे हैं
कढ़ाई और पढ़ाई के बीच।
©seemasarda
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