खामोशी

शब्दों से परे, सन्नाटे में बसी
एक आवाज जो कभी नहीं डसी

मन की गहराइयों में छुपी
चुप्पी की एक मीठी लड़ी

सुनो, कैसे बोलती है खामोशी
अनकही बातों की वो पोशी

आँखों में छिपी, मुस्कान में गहरी
शब्दों से अधिक कहती हर पल की डगर

किसी राज़ की तरह मौन खड़ी
खामोशी, तू ही सच्ची कवि की कलम