खामोशी बोलती एक अनकही भाषा,
वह जो कहती, सुनाई नहीं देता कानों को।
उसका अर्थ समझने, पढ़ने को होती आँखें,
और वह संवाद जो अदृश्य होकर भी हर पल जीवित।
खामोश रातों में, सितारों की गुफ्तगू,
और धूप में गिरती छाँव की कहानियाँ।
यह खामोशी, है एक अनसुना गीत,
जो सिर्फ महसूस किया जा सकता है, सुननेवाला कोई भी हो।
इस खामोशी के क्षण, जब शब्द होते विरामित,
वहाँ जीवन के कुछ सबसे गहरे रहस्य खुलते।
शायद इसीलिए, खामोश रहकर,
कभी-कभी हम सबसे ज्यादा कुछ कह जाते हैं।