कई टूट चुके ख्वाब को..
कुछ वक्त के जवाब को...
कल की उम्मीद में । घुटते हुए आज को ।
हटते अपनों के साये में। छुटते हुए साथ को ।
इन मतलबी फितरतो के बीच...
हमने, पहले कहां ये मंज़र देखा है?
चेहरों पर झलकती शिकस्त के पीछे...
पनपते हुए ख्वाब को अंदर देखा है।
और,
किनारों से कई दूर है घर हमारा...
हमने कहां समंदर देखा है??
©sahilsing2
S