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ख़ामोशी

ख़ामोशी
ना खुश हु मै , ना गमजदा हु मै ।
बस अब खामोश हु मै ।
जब् महफिल में सब लोग हँसते है ।
तब हम अपनी तन्हाई में खो जाते है ।
बोलने में हमे हमारा अतीत नजर आता है ।
और ख़ामोशी में हमे हमारा वर्तमान नजर आता है।
हम हमारा आलम कैसे बाया करे ।
हम ना तो ग़मजदा है ।
ना आशुफ्ता है ।
ना हमे जीवन से इश्किया है ।
ना बेखुदी का डर ।
ना आँखों में रवा आँशु है ना होठों पर मुस्कुराहट ।