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खोई हुई शाम!

अस्थिरता से चूर ये मन एक शाम में संभल गया था,
एक शाम ही थी जिसे मेरी उदासी का पता चल गया था।
सब तो लुट गया था , बस अब टुकडों में बंट जाने की देरी थी,
हक़ सिर्फ एक शाम पे था, एक शाम थी जो मेरी थी।
                            
एक शाम थी, जिसने शीशे से मुझे अलग कराया था,
एक शाम थी, जिसने तारों से मुझे मिलवाया था,
एक शाम थी, जिसने हवाओं से मुस्कान लूटना सिखाया था
एक शाम थी, जिसने सपनो को सामने ला बिठाया था।
एक शाम से ही तो हुई थी दोस्ती पहली बार,
एक शाम, जो किसीसे मांगी थी उधार।
वो शाम मेरे कानों में कुछ गुनगुना रही थी,
वो शाम जो कई रातों के किस्से सुना रही थी।
उसके आने से पहले एक मौलवी आधान के बिगुल  बोता था,
उस शाम को भी इसी आवाज का इंतज़ार होता था।
शाम भी चाहती थी मैं रोज़ ही यूँ मिलता रहूँ उसे,
नमाज़-ए-मग़रिब की तरह रोज़ दिल से पढ़ता रहूँ उसे।
पर अब इस बदलते वक़्त ने उस शाम को कहीं छुपा रखा है,
काली स्याह रातों में, उसको कहीं दबा रखा है।
एक शाम नही है, तो तन्हा हूँ।
एक शाम है, जिसे ढूंढ रहा हूँ।
©a_friend