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खुली खिड़किया

जब कभी मैंने खुद को अकेला पाया
हाथ थाम ठंढी हवाओ से भर देती है ये खुली खिडकिया
दूर तक देखने की चाह में जब कभी खुद को आजमाया
नजरो को नए नजारे दिखाती है ये खुली खिड़किया
जब मन को अशान्त,तन को तनाव में पाया
अंदर से झिंझोर एक नई शाख दिखाती है ये खुली खिड़किया
हर आंधी तुफा को कैसे काट जाना है
ऐसे हजार तरीके हमे सिखाती है ये खुली खिड़किया।।
:-© रूपेश दुबे
©luckypande