“ख़्वाब जो सोने नहीं देते”🔥✨
ख़्वाब मेरे आसमाँ से भी ऊँचे आरज़ू, मेरी समुद्र सी अथाह हँसी,
मेरी कही खो ना जाए, ये डर ही हमेशा मुझे सताए।
महफ़िल में तो हम खूब हँसते हैं, पर ना जाने क्यों हम तन्हाई में खामोश हो जाते हैं।
नहीं जानते कैसे हैं हम, बस इतना जानते हैं कि हमसा कोई नहीं।
मेरी मंज़िल ही मेरी कशिश है, मेरी मंज़िल ही मेरी चाहत है।
दुनिया से सितम सहकर भी हमें हमारी मंज़िल मिल ही जाएगी कभी ना कभी।
मेरी बेबसी का कोई फायदा उठाए, कोई बात नहीं, पर जो हमारी तक़दीर में होगा वो मिलकर ही रहेगा।
मेरी ख़्वाइशें भी मेरी मंज़िल हैं, मेरा जीवन भी मेरी मंज़िल है, मेरा समर्पण भी मेरी मंज़िल है।
मुझे शिकवा नहीं उस रब से, ना कोई गिला है, उसने जो कुछ भी दिया है हद से ज़्यादा दिया है।
हम काली रातों में जब सोते हैं, तब भी अपनी मंज़िल का नाम रटते हैं।
सूर्य के प्रथम अंशु के साथ उठते हैं, तब भी अपनी मंज़िल का नाम रटते हैं।
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