किलकारियां गूंजती कानों में
यही तो ममता की निशानी है
यह मातृत्व का स्वर्णिम सुख
निसंतान मिट जाता दाग है
जब तक ना हो किलकारियां
तब नन्हे कदमों की आहट से
मिट जाता दुख घर संसार से
कोमल हाथों की उंगलियां मैं
ढूंढता रहा अपने बचपन को
वह मेरे अंश की निशानी वंश
ना होती किलकारी चरित्रहिन
कानों से मर जाती है जिंदगी
पता नहीं क्यों यह प्रकृति
ये रस्मो रिवाज क्या है जीवन
हर कोई निभाना चाहता इसको
पिता और माता दादा दादी सब
तुम रिश्ते की पहली शुरुआत हो
रिश्ते में भाई बहन बेटी बेटा
रिश्तो का जन्म लेते किलकारियां
नन्हे कदमों की आहट खुशनुमा
©lawnishtha
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