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किरण आशा की..

तिमिर भरे पथ पे बस यू अकेला,अनजान इक मुसाफिर हुआ चला जा रहा था, न थी खुद की सूद और थी न कोई खैरियत..बस चला ही जा रहा था..
न हो पा रहा था दौर ए मुलाकात का दस्तूर स्वयम की परछाई का,
इस अंधेरी रात की वीरान सड़क पर..
नजर न आ रहा था मंजिल ए सफर का रस्ता, न ही समझ आरहा था फलसफा ये अंधेरे का.. तिमिर की ठोकरों में बस युही चला जा रहा था...
लेकिन,फिर जैसे ही चौराहे की पीत रोशनी प नजर पड़ती है.. फिर एक बार तिमिर छट ता है, नए रास्ते अपना मार्ग खोल देते है..
मन ही मन सुकून का घूट पीता हूँ... देर किए बिना बस, स्वयम की स्वयम से भेंट करा देता हूँ और खुद को मौजूद पाता हूँ.....
©dharm