लिखना चाहती हूं बहुत कुछ,
पर आज कागज़ नहीं,
शब्द कम पड गए।।
जाना चाहती हूं बहुत दूर,
तेरे संग सुकून से भरे कुछ,
पल बिताने के लिए,
पर आज समय नहीं,
अपनापन कम पड़ गया।।
कहना चाहती हूं,
सब कुछ तुम्हे,
बताना चाहती हूं हर बात,
पर आज सुनने वाले मुझे,
खुद ही चुप हो गए।।
अंदर का सैलाब जो उठ उठ के,
हिलौरें मार रहा है,
बाहर आने के लिए,
उसे मैंने खुद ही दबा दिया,
कही बयान ना हो जाए,
आंखों से सब कुछ,
इसलिए पलके झुकाकर,
चुपचाप चलना सीख लिया।।
दफन हो रही है खवाईशे,
सारी की सारी,
और मैं बेबस सी लाचार,
खड़ी हूं अलविदा लिए।।
©anvisha
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