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कोई तो हो,

कोई तो हो जिसके इर्द-गिर्द मै रह सकूँ
जिससे उलझने में दिल की कह सकूँ
चाहे भाई बहन या माँ हो,
दोस्त या महबूबा हो
कोई तो हो,
क्योंकि ये दिल एकांत नही रहना चाहता,
क्योंकि ये जग शांत नहीं रहना चाहता.
दिन की हर उठा पटक के बाद दिल डर सा जाता है
हर आतंक से सिहर सा जाता है़़जब निराशा की चादर ताने अरमाने सो जाती है,
जब उम्मीदों की तम हर किरणें ना उम्मीदों में खो जाते हैं
तब कोई तो हो ़
कोई तो हो
जिसे अंधेरे में टटोल के बाहों में भर सकूं,
लिपट गले जिसके मैं हर डर को कह सकूं।
कोई तो हो
जिसके इर्द-गिर्द मैं रह सकूं
जिससे उलझने मे दिल की कह सकूं।।
©abhitrip