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कुछ पल तुम्हारे साथ

जो पल गुजरे थे साथ तेरे
उनकी खुशबू अब तलक फिजाओं में है
वो मुस्कान जो तेरे लबों की थी
उसकी चहक हवाओं में है
यूँ ही तो नहीं मिले होंगे हमसे तुम
कुछ तो राज इस मुलाकात का होगा
ज्यों खुल गए थे यूँ एक दूजे है साथ
जरूर तालुक जज्बात का होगा
दो पल में रिश्ता लगा सदियों सा
जैसे हो गया संगम दो नदियो का
वो व्यथा को अपनी अल्फाज देना
यूँ सब कुछ कह कर भी कुछ न कहना
वो सिहर कर सिमट जाना अपने ही शब्दों में
वो बिखर कर फिर यूँ जुड़ जाना
कुछ तो मतलब उस हालत का होगा
कोई तो रिश्ता इस जज्बात का होगा
वो सुनकर तेरी व्यथा पूरी
जैसे पट गई थी आत्माओं की दुरी
वो तेरा यूँ नजरें चुराना
देख कर एक पल पलकें गिरना
वो उस घुप अँधेरे में कुछ पल साथ चलना
वो वीरानियों का खुद बा खुद पटना (खत्म होना)
वो कोहरा फिर आँखों का छटना
वो जीवन को नै उमंग फिर मिलना
शायद रिश्ता पूर्व जन्मो का होगा
कोई तो है मित्र, बस जो अपना सा होगा
लगता है ये सब नहीं हकीकत
जैसे बस एक सपना ही होगा
©mukhar