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क्या चल रही थी दुनिया....

क्या चल रही थी दुनिया ....
इन्सान पैसो के पिछे भागता रहा,
तो कभी एक दुसरो की टांग खिचते रहा,
सब पाप करते रहा, और छोड दिया एक दुसरो का साया.
आज बोल रहा है बहुत कुछ बेजुबान व्हायरस कोरोना,
कभी बोलता इन्सान कभी न देख पाया एक दुसरो का रोना.
जिंदगानी बस युही बिती ,यही कथा है जीवन की,
आज सबकुछ छोङकर जयजयकार कर रहे है वेदमुनियो की.
कभी कोरोनाओ मरिजो की संख्या हमने बढते देखी, तो कभी हमने यहा कईओ की चुस्त तंदरूस्त होते देखा,
ठिक हुए मरिजो को जब घर जाते देखा ,तो कईओ को हमने उनपर बहिष्कार ङालते हुए भी देखा.
ङाॅक्टरो ,सफाई कर्मचारी, पुलिस भाईओ को यहाॅ हमने एक होकर लढते देखा,
तो थक हारकर जब ये घर गए तो पङोसियोने इनके सामने अपने घरो के दरवाजे भी हमने लगाते देखा.
अरे देशवासियो अब तो समझ जाओ,
कोई पीर,कोई मौलवी, कोई पुजारी,कोई फादर न काम आया,
हम अब मेहफुस है तब तक ,जबतक है ङाॅक्टर और पुलिस भाईओ का हमपर साया.
अब तो कोई हाथ भी ना मिलाएगा, ना मिलाएगा कंधे से कंधा.
ये दुनिया है, सब जानती, समझती है साहब,
बदलते इन्सान के तेवर, बदलते इन्सान के रंग-संग छोड भी दो अब यह गोरख धंदा.
निरज सोनवणे-
©niraj1111