इक पल भी गुजारा कर लेते
तुम्हारे लिए कुछ खास नही था
आज खाते हो दर दर की ठोकरें
क्या चीज की कमी थी तुम्हें
क्या तुम्हारे पास नही था
बहारें भी थी गुलशन में
नज़रे भी जवां थी
साथ महबूब भी था
और रौशन समा थी
मौसम भी रंगीन था
कातिल अदा थीं
इन अदाओं का जमाना फिदा था
क्या चीज की कमी थी तुम्हें
क्या तुम्हारे पास नही था
तेरे आंखें नम क्यूं है
जो चांद के जैसे खिलते थे कभी
मासूम चेहरे पे ये गम क्यूं है
क्यूं खामोश हो
तुम्हारे गालों पर झरने से बहते
ये आंसुओ के शबनम क्यूं है
कान्हा ने बंसी बजाना तो नही छोड़ा
क्या राधा को उसपर विश्वास नहीं था
क्या चीज की कमी थी तुम्हें
क्या तुम्हारे पास नही था
©ramnivas
R