जब झमाझम बारिश
होती थीं
कागज़ के नाव बना कर
बहते पानी में तैराया करते थें
क्या वो जिंदगी थी.....
कापी के कागज़ फटे देख
मां डंडे लेकर दौड़ाती थी
डर के कारण कहीं
कोने में छिप जाते थे
क्या वो जिंदगी थी.....
फिर अगर मिलते थे
तो मुस्कुरा कर
गले लगा लेती थी
क्या वो जिंदगी थी.....
मुझे याद है,
जब मां ने
बिमार होते हुए भी
खाना बना कर खिलाया करतीं थीं
क्या वो जिंदगी थी.....
जब स्कूल से आते थे
ललाट पर हाथ रख
बुखार देखा करतीं थीं
फ़िर लिबासो को उतार दिया करतीं थीं
क्या वो जिंदगी थी.....
आज सपना हो गया है
जब आज मां नहीं है
सिर्फ एक झलक पाने को
ये आंखें,तरस जाती है
आज मां की याद बहुत आती हैं।
"Aman kannaujiya"
©amanlxn
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