उन्होंने बैठना नहीं सीखा
दिन मे सो जाना नहीं सीखा
सीखा है तो दिनभर धूप मे जलना ताकि तुम ac मे बैठ सको
इतनी मेहनत करते है ताकि तुम खुशियाँ खरीद सको
बच्चों को अच्छा भविष्य मिले, बहन को अच्छा घर मिले
इसलिए बस जिम्मेदारी का बोझ उठाये फिरते है
पर बच्चों के साथ खेल नहीं पाते, बहन के साथ मस्ती और माँ का प्यार नहीं पाते
कभी जताते नहीं है सबकी बस सुनते जाते है
पर कभी शिकायत नहीं करते है जनाब
लड़के भी रोते है साहब
पिता की आज्ञा, भाई का फर्ज़ और परिवार की जिम्मेदारी
सब कितने शोक से पूरा करते है
थक कर चूर हो जाते है
पर पापा तो फिर भी "नाकारा" कह देते है
तूने मेरा फॉर्म नहीं भरा भैया
कहकर बहन मुँह बना देती है
कभी बच्चे तो कभी बीवी की सुनते जाते है
पर बदले मे बस एक मुस्कान दिखाते जाते है
माँ के आँचल मे छुपकर नहीं रोते वो
पर कमरे मे अकेले जाकर रोते है
आंसू नहीं दिखते उनके पर,
कोरे उनकी भी गीली होती है
इनको भी दर्द होता है,इनके भी दिल दुखते है
पर कभी दिखाई नहीं देता है जनाब
लड़के भी रोते है साहब
देखा है तुमने कभी चक्की को चलते हुए
उसके दो पाटो के बीच गेहूं को पीसते हुए
माँ और बीवी के बीच ये भी ऐसे ही पीसते जाते है
सैंडविच को बड़े चाव से खाते हो तुम
पर उसमे भी एक लड़का पिसता दीखता है
जैसे ब्रेड की दो स्लाइस के बीच टमाटर
वैसे ही बीवी और माँ के बीच अटक कर
बेचारा मारा जाता है, कितना धिक्कारा जाता है
सबकी अपनी तकलीफे है सबके अपने किस्से है
पर ताने और उलाहने ही उसके हिस्से है
उसका दर्द कोई नहीं समझता जनाब
लड़के भी रोते है जनाब
लड़किया जब घर छोड़ती है
तो दर्द महसूस होता है ना
पर जब पढ़ने और कमाने को लड़के घर छोड़ते है
तो महसूस होता है दर्द क्या
जब वो पराये शहर मे एक कमरा लेकर,
आधी कच्ची रोटियां सेक कर खाते है ,
और कभी भूखे ही सो जाते है
वो दर्द कभी समझा है क्या
जब देर रात को पेट दर्द हो कभी,
तो वो चुपचाप पड़े बस सहते है,बुखार मे तपते रहते है
ये लड़के भोले होते है,इनको लड़की बनना नहीं आता
खुद का इलाज करना नहीं आता
तब इनको भी माँ और बहन की याद आती है जनाब
लड़के भी रोते है साहब
✍️शिवन्या
©04shivanya
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