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लो फिर से आई ९वीं जुलाई।

आज फिर वही घड़ी है आई,
जिसने घर में तुम्हारे थी चित्कार मचाई,
लो फिर से आई ९वीं जुलाई।
हां! माना कि नहीं देखा तुमको,
न तो बातें करके जाना - पहचाना,
पर बहुत ख़लता है विरल भाई,
तुम्हारा यूं इतनी जल्दी दुनिया छोड़ जाना
लगता है मानो अपना है कोई नाता पूराना,
बिना अपनेपन तो संभव नहीं,
आंखों का गंगा-यमुना हो जाना,
'कल्याणी' बड़ा कठिन है,
मनोदशा को शब्दों में बंध पाना।
सालों से कहती आई मैं भोलेनाथ से,
ध्यान रहे नाथजी! मेरे होंठों को,
मुस्कान देने वाले को कभी न रुलाना।
हर बात मानने वाला नाथ मेरा,
इसे न जाने क्यों न माना,
नहीं सहा जाता,
मेरे होंठों को मुस्कान देने वाले का,
पुत्र वियोग कष्ट उठाना,
ऐसे में तो स्वाभाविक है ना,
महादेव पर क्रोध का आना।
आज फिर वही घड़ी है आई,
जिसने घर में तुम्हारे थी चित्कार मचाई,
लो फिर से आई ९वीं जुलाई।
©kalyani199