आँगन की सौरभ है अंगना,
मन की सौरभ है करूणा,
कही न जाय माँ की ममता,
क्योंकि सबको देती निर्ममता!
उदर-दरी में रखकर नौ महीना,
प्रसव-पीड़ा,दुःख-दर्द माँ सहती कितना;
भूमि-भार से बढ़कर माँ की कोख होती,
जब पल रहीं होतीं है इनकी पेट में सप्नों के गुड्डा-गुड़िया!
माँ वसुधा,प्रकृति की रूप है,
जहाँ खिलती रंग-बिरंगी प्रेम-क्यारियाँ;
माँ ममता,शहनशीलता ,धैर्य के गंगा से,
जहाँ सिंचती अन्तरात्मा की सुन्दरत्तम क्यारियाँ!
आओ,ममता-मयी माँ को दिल से हम करें सम्मान,
इनके चरणों में नतमस्तक हों कर जोड़ी करें प्रणाम!
भगवान से भी बढ़कर हमारे लिए माँ की स्थान;
तन-मन-धन से हम कर जोड़ी माँ को करें प्रणाम!!
------!! संदीप कुमार "संजन"
भगवानपुर,अररिया,बिहार
---------------------------------------------!!
©skmahto
S