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मां

जिंदगी में पहली बार तुझ पर कुछ लिखने का हिमाकत किया है, पता है मुझ में है कमी पर यह मैंने दिल से यह शिद्दत किया है घुटनों से कब रेंगते-रेंगते मै पैरों पर खड़ा हुआ तेरी आंचल की छांव में मां मैं कब बड़ा हुआ,
तेरी बात जो कभी लगती थी गाली इस अब दुनिया की सबसे लगती है प्यारी
मां मुझे आज भी यह बातें समझ नहीं आती तू हर दुख को हंस हंस के कैसे है सह जाती
मेरी एक आह पे सबसे पहले मेरे पास है आ जाती
ठंड तुझे लगती चादर तू मेरा सही कर के जाती
मा मै तुझे परिभाषित कर दू ये मेरे और मेरे कलम कि ताकत‌‌ नही तू है तो‌ मै हू तेरे से ही मेरा रुप है,
इस शरीर का हर सांस तेरा हकदार है ,
जब चाहे तू मांग ले यह तेरा कर्जदार है,
वो मेरी मां तेरे में ही मेरा संसार है।।
©luckypande