मैं तो जुलाई में हि, पुरा लुट गया,बर्बाद हो गया,
जब पांच तारिख को, मुझसे मेरा खुदा रूठ गया।
ज़माने कि सारी,मौहब्बत, इक तरफ,और इक तरफ, बस मां का आंचल,ही काफी है।मुझे परेशानियों का,कभी भी ईल्म ना रहा,क्योंकी हर लम्हा, मां कि मौजुदगी काफी रही।मां ऐसी शख्सियत हैं,जो शब्दो में बयां नहीं होती।
बदनसीब होते हैं, वो जिनके पास मां नहीं होती।
आज भी मां,ज़माना कई ज़ख्म देता है मुझे।
और तेरी नामौजूदगी,मुझे हर पल खलती है।
कितने प्यार से, पाला है तुने मुझे,
यह कमी, हर घड़ी, मुझे पता चलती है।
दुनिया कि ठोकरो में, मुझे हर वक़्त संभालने,अब मेरे पास तु,नहीं रहती है।मां वो शक्ति है,जो पुरे परिवार कि तकलीफें,अकेले ही सहती है।ऐ मां,एक बार फिर से, आएगी क्या बता,कि मुझे, फिर से,गोद में खिलायेगी क्या बता? ये दुनिया, तुझ बिन, बहुत सुनी है मां,
इक रोज़, तेरे संग, मुझे ले जाएगी क्या बता।
कवि:-अभय ना.ताकसांडे
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