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" मै मन की मों व्यथा " 🥺

" मेरे मन की मोन व्यथा " 🥺
ख्वाब था हमारा एक ऐसी दुनिया बनाने का ।
जहाँ ना हो कोई रंजिश , ना कोई पीड़ा ।
पूछता है कोई मुझसे कोई हँसती हु मै इतना ।
मगर कभी गम भुलाने को भी थोड़ा हँस दिया करते है ।
कहूँ क्या में अपने मन की पीड़ा ।
इससे अच्छा है कि मै मोन रहु।
सुनेगा कौन मेरी मोन व्यथा ।
हमने आईने के सामने खुद को मुस्कुराते हुए देखा है ।
मगर अंधेरी रातों में खुद को टूट जाते हुये भी देखा है ।
किसी को सहारा देने के लिए हाथ भी बढ़ाया है ।
मगर उसने भी मुझे मेरी औकात देखा दी ।
लोग आसानी से कह गये की तूने किया ही क्या मेरे लिए ।
जिसको सहारा देना था वो दे दिया ।
क्यों न मै अब अपना ख्याल रखु ।
दुनिया को खुश रखने के चक्कर में , मै क्यों दुखी रहूँ?
नही चाहती इससे अच्छा ये हो जाता , इससे अच्छा वो हो जाता ।
चाहती हु , इससे अच्छा और कुछ न हो ।
नही चाहती मै अब बेखुदी में खोना , ना चाहती हु अवसादो से घिरना ।