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मैं और तुम

मैं तुम्हें चाहूं और तुम मुझे न चाहो,
ऐसा कभी हो नहीं सकता।
एक साथ खेला-कूदा,एक साथ पढ़ा,ये तुम भुला दोगी,
ऐसा कभी हो हीं नहीं सकता।
थामा तुम्हारी हाँथ जब सावन में पखडंडी से
तुम फिसल रहीं थीं, ये याद न आए,
ऐसा कभी हो हीं नहीं सकता।
स्कूल हो या बाजार,रास्ते में हाँथों में न हों हाँथ ,
ऐसा कभी हो नहीं सकता।
वादा हो या शर्त जिसे हम न निभाया हो,
ऐसा कभी हो हीं नहीं सकता।
वसंत के बहार में आमों के बाग में ,
जीवन साथी की बात न हों,
ऐसा कभी हों नहीं सकता।
चाँद,तारे,गगन,वसुन्धरा ये बदल सकते हैं,
लेकिन हम तुम जीवन साथी से विमुख हो जाऊँ,
ऐसा कभी हो हीं नहीं सकता;
ऐसा कभी हो हीं नहीं सकता
--------- संदीप कुमार "संजन"
भगवानपुर,अररिया,बिहार
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