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मैं बदकिस्मत ,मजदुर का बच्चा हूँ।

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मेरे ख्वाबों की उड़ान थम सी गयी हैं,
अब मैं ज़िन्दगी से पाठ पढ़ता हूँ।
विरासत मे मिली हैं यह गरीबी मुझे,
मैं बदकिस्मत, मजदुर का बच्चा हूँ।
हाँ मै भूखा हूँ और हताश भी,
वक़्त की फिर पड़ी मार हैं।
शिक्षा शायद मेरा भाग्य नही,
यह सत्य अब मुझे स्विकार्य हैँ।
Online class, तो हैं विकल्प अमीरी की,
यहा किताबो से रूबरू हुए कुछ वक़्त हुआ,
दो रोटी की जद्दोजहत मे,
बस पीस रहा बचपन मेरा।
टूटे सीसे की मैं महल बना लूँ,
अभी इस हुनर मे थोड़ा कच्चा हूँ।
विरासत मे मिली हैं यह गरीबी मुझे,
मैं बदकिस्मत मजदुर का बच्चा हूँ।
माँ के आँचल मे थक सो जाऊँ,
ऐसी नींद हमे कहा मिल पाती हैं।
हमारा तो बचपन ही हमसे छीन गया,
जिम्मेवारी हमे नींद से जगाती हैं।
माना, क्षणिक संकट है यह यथार्थ नहीं,
काल रूपी विपत्ति भी एक दिन हार जाएगी!
रौनक होगी फिर विद्यलयों मे,
बच्चों की खिलखिलाहट से उसमे जान आएगी।
उस रोशनी मे भी एक अँधेरा होगा,
कुछ कमी तो तुम्हे, खल ही जाएगी।
शिक्षा तब आएगी, फिर द्वार मेरे,
पर यह गरीबी मेरे सपनो को निगल जाएगी।।
मैं देवतुल्य शिक्षको से शिक्षा कैसे पाऊँ,
दिखता शायद अब मैं इन हालातो मे ही अच्छा हूँ।
विरासत मे मिली हैं गरीबी मुझे,
मैं बदकिस्मत मजदुर का बच्चा हूँ।
-रितु तिवारी
©ritutiwary