मैं इतना बदल जाऊं यह सोचा ना था हमसफर मेरे
आज वक्त इतना बदल गया सिर्फ सिर्फ तुम्हारे लिए
रोशन दिया सिर्फ अंधकार मिटाने जलता रहा रात में
तुम्हारे आंगन की रोशनी को देखकर खुशी तो हुई है
सिर्फ तन्हाई को उम्मीद की किरण तुमसे मिलती है
मगर जमाने को तो अपनी हर बात तुमसे मिलती है
हर कोई समझता अपनी भाषा और स्नेह मिलन को
हर कोई समझता अपनी भाषा और स्नेह मिलन को
कितना कुछ जानते हैं तुम्हारे और मेरे दरमियां दोस्ती
लोगों की जुबां को तुम्हारा और मेरा मिलना गलत है
लोग आज भी तलाशते हैं कमी तुम्हारे मेरे बीच में
तुम्हारा पवित्र रिश्ता उस किताब के कोरे कागज का
जिस पर लिखा तो नाम सिर्फ इतना था कि तुम हो
पेजों पर तुम्हारे त्याग समर्पण और कुर्बानियां लिखें
पता नहीं इस समाज में कौन किसका दुश्मन बना
आज भी माथे की बिंदी चमकती उसी पूर्णिमा चांद
तुम्हारी उपमा चांद से भी कर दें तो लगता है दाग सा
तुम्हारी पवित्रता इतनी है कि वो दाग भी नहीं दिखता
©lawnishtha
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