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मैं कांच ही तो हुँ

सुनो, मैं कांच ही तो हुँ बार बार टूट जाती हुँ,
इसे फितरत समझकर तुम कभी नकार मत देना,
एक जमाने से क़ैद हुँ बस, इस निग़ाह-ए-कफ़स में,
कभी धूल समझ कर इसे, आंखों से निकाल मत देना,
ये छाँव इश्क़ पर ही नहीं, मेरे सम्मान पर भी है,
गर कभी हिज़्र के बादल भी हो तो अस्वीकार मत देना,
वैसे तो सहारे की जरूरत नहीं है, मोहब्बत को मगर,
कभी उठे ये हाथ तुम्हारी तऱफ, तो इसे इंकार मत देना..!!
©priya_vish