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मौहब्बतो का सैलाब

बहुत गंध है,इन हवाओं में,
नफ़रतो कि बुं आ रही है।
चलो नौजवानों अब मेरे साथ,
मौहब्बतो का तुफान लाते है।
वो उकसाएंगे युद्ध कि तरफ चलने को,
हम भगवान बुद्ध कि राह अपनाएंगे।
वो बनाना चाहते हमें हिंदू, मुसलमान,
हम हिर रान्झा बन जाएंगे।
वो देना चाहेंगे, पत्थर और हथियार हमारे हाथ।
हम पकड़ एक दुसरे का हाथ, किताब और फुल अपनाएंगे।
और जब जब, धर्म कि कट्टरता में डुबोएंगे वो हमें,
हम नौजवान मिलकर, मौहब्बतो का नया सैलाब लाएंगे।
मानवता को बांटने, वो नये नये पैंतरे अपनाएंगे,
हम प्रेम कि एक ओस बनकर,हर पत्ते पर छा जाएंगे।
धरती का रंग लाल और दहशत, वो सब पर मचाने आएंगे,
इसी धरती में दफन हो हम, अपने लहु से इसे सिंचकर,
फुलों के बीज लगाएंगे।
महका कर यह सारा समां, प्रेम कि खुशबु सर्वत्र बिखराएंगे।
लाख करे वो कोशिशें हमें बांटने कि, धर्म, जात या ईज्जत के नाम पर,
हम नौजवान तो बस,पुरी कायनात तक, मौहब्बतो का सैलाब लाएंगे।
कवि:-अभय ना ताकसांडे

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