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मधुशाला मधुशाला

हर सवाल खामोशियां देता है सिर्फ जवाबों की तलाश है
तुम भी कुछ परिंदों की उड़ान से हो सवालों में कहां आज
बेहतर यह है कि तुम और मैं मैं और तुम एक हैं इंसान बस
सवालों का क्या है यह तो टूटते बिखरते रिश्ते रहे हैं सर्वदा
कभी कदमों की आहट नहीं सी की पहचान लेते तेरे खबर
झूठा ही सही था तेरे आने का मेरे शहर में नुमाइश के लिए
कभी उस गली पर तुम्हारा मुशायरा, जहां मंदिर की घंटियां
तुम्हारी अजान मंदिर की घंटियों का स्वर मन मोह लेता है
समय सब कुछ एक साथ सिर्फ नफरत नहीं तेरे मेरे मध्य में
कभी तलाश तेरी मेरे घर तक कि कभी मेरी तलाश तेरे घर
कभी मुझ पर ना आना कभी तेरे साथ में मिल बांट खाना
कभी तो हार पर तेरी खुशियां मेरे घर के आंगन में बैठना
यूं तो कई हमसफर थे तेरे मेरे यारी और दोस्ती के शहर में
बस शहर में अमन-चैन होता तो आज नफरत है कहां थी
हरिवंश राय की एक मधुशाला हमेशा संगम की साला है
जहां कोई ऊंचा नीचा सबकुछ मधुशाला और सिर्फ मधु है
जहां ना नफरत है ना आंधी है सिर्फ तूफान को मिटाती है
मधु की तलाश में लोग कहां से कहां चले गए नफरत मिटी
रंग रूप कैसा बीता मधुशाला ने सब को एक कर दिया है
तलाश मधुशाला की जब होती है तो कोई छोटा बड़ा नहीं
नाम के पीछे सरनाम ना लगाओ तो पता नहीं कौन जाति
यही रिश्ता मधुशाला ने सिखाया इंसानियत का इंसान को
कभी दो कदम चलती कभी डग मग रिश्तो की डोर है मधु मधुशाला एकदम कई प्याले हैं सब रिश्तो की मधुशाला से
एक पवित्र रिश्ता बन जाता ,अजर अमर मधुशाला जग में सुबह होखे तो शाम हो गई मधुशाला बदनाम हुई रिश्तो में
तभी तो साथी से पिला दे कभी नाम से पिला दे मधुशाला
कभी सुखी तो कभी चरखी कभी तीखी तो कभी कड़वी
मदहोशी का आलम बस इतना था कि मधुशाला मधुशाला
कौन कहां रिश्ता निभाता दिलवाले की मधुशाला मधुशाला
©lawnishtha