कुछ पूछना मत मुझसे तुम!
बहुत कड़वी बातें करता हूं...
वो अंधेरे में छुपा है दोस्त मेरा,
मैं उससे ही सब कुछ कहता हूँ।
हुआ कई बार मेरे साथ ऐसा,
दबा था वक़्त के तले बहुत..
तिनका तिनका मेरा ज़मीर छिन रहा था मुझसे,
खयाल! तो पहले ही चोरी हो चुके थे बहुत।
छुपाने के लिए ज़मीर मेरा,
उसे यादों से ढक के रखता हूँ,
वो यादें मुझे देता है दोस्त मेरा,
मैं उससे ही सब कुछ कहता हूँ।
डरता हूँ जब रोज़ शाम सूरज मुँह मोड़ लेता है,
कहीं कमबख्त बत्ती न जल जाए कोई।
कितने गुनाहों से घर का सामान सजा रखा है,
इस बात की गवाही न दे जाए कोई।
इतनी कोशिशों के बाद भी इस शरारती खिड़की से डरता रहता हूँ,
ऐसे में पर्दा बन खिड़की से लिपट जाता है दोस्त मेरा,
मैं उससे ही सब कुछ कहता हूँ।
माफ़ करना मैं गरीब हूं तुमसे,
तुम्हारे शौक मेरे हालात पे हंसते हैं,
तुम्हारी खैरात से भूख मिटती है मेरी,
मेरे दर्द, तुम्हारे मज़ाक में बसते हैं,
फिर भी खुद को कहता हूँ अमीर,
जब औकात चवन्नी की रखता हूँ,
कई करोड़ो का हीरा है दोस्त मेरा,
मैं उससे ही सब कुछ कहता हूँ।
©a_friend
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