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मेरा गाँव

सुन्दर प्यारा गाँव हमारा,
पिपल की छाँव में खेले बच्चा सारा।
नयन हमारा जहाँ तक जाय रे,
हरी-हरी खेत धान,मक्का के दिख जाय रे!
बाँस-कुंञ्ज , वृक्ष-लता से,
हरी-हरी सुन्दर दिखे मोर गाँव रे!
द्विदिशा से घिरे नदी किनारे मोर गाँव रे,
कलकल-छलछल कर गाती जाती तीव्र वेग से,
उस 'कारी कोशी' नदी की तट पर मोर गाँव रे!
ढाई किलोमीटर दूर है बाजार,
जहाँ भगवानपुर नदी की इसपार,
कालाबलुआ आकर्षक बाजार है,
हर युवा करते इनसे बहुत प्यार हैं!
चाहे आये भूकंप या बाढ़,
फिर भी डटे रहते मेरा गाँव!
इतिहास है साक्षी मेरा गाँव का,
आज तक कोई मरा नहीं भूकंप या बाढ़ से!
नदी के तटों से दूर-दूर तक,
विस्तृत फैला भूभाग की मैदानें,
जिसमें लगते धान-मक्का,मम्फली के
रंग-बिरंगी हरियाली खास फसलें!
जब भी कोई लोग जाते हैं बाढ़ के समय
मेला या बाजार,
कारी कोशी को पहले हिम्मत से करने होते हैं पार,
बाँस की पतवार से,धैर्य की डोर से,
कस्ती में बेठकर होते हैं लोग तटों के उस पार!
जब नावों में सवार रहते हैं बहुजन,
हलक में अँटके होते हैं इन सबों के प्राण,
लेते रहते हैं 'कोशी मैया'या भगवान के नाम,
फिर मानों तब बचते हैं लोगों के प्राण!
(पार्ट-01)
------ संदीप कुमार "संजन"
भगवानपुर,अररिया,बिहार
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