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मेरी बेवसी

मन रोता है,आँख से आँसू बहता है,
मेरी बेवसी पर मुझे ही आज शर्म आता है।
सूर्यताप-सा हृदय मेरा जल रहा है,
अन्दर हीं अन्दर मानो हृदय फट रहा है।
बेरोजगारी से बढ़कर कोई बेवसी नहीं होती
बेवजह बेरोजगार मजदूर हजारों आज मरे न होते।
बेवस हूं,लाचार हूं,बेरोजगार हूं,
वक्त का मारा हूं,गरीब हूं,लगता है धरती की बोझ हूं।
हृदय कचोट रहा है,लगता है सुई कोई चुभो रही है,
सरकार है एसी जो केवल अपनी ऊल्लू सीधी कर रही है
"संदीप"जब भी कोई मरता है,गरीब हीं मरता है,
गरीबों के नाभ पे तो केवल धनवान हीं जीता है।
©skmahto