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मीरा को यूं मूरत में समाना न पड़ता...

इस तरह काँटों पर चलकर उसे दिखाना न पड़ता...
और तुम्हारी कसम,तुम्हारी कसम करके समझाना न पड़ता...
और समझ जाता प्यार को इतनी आसानी से कोई...
तो मीरा को यूं मूरत में समाना न पड़ता...
डूब जाएंगा उन आंखों में संभलते संभलते भी
तू..,बेशक दरियाओं में क्यूं न तैर रखा हो...
और जब रख देगा इश्क़ की राहों में कदम अपना...
तब पता चलेगा जैसे जल्लादों की बस्ती में पैर रखा हो...
और मुकम्मल करना इश्क़ मेरा ऐ ख़ुदा इबादत भी रोज़ करेगा तू...
अंदाज़ा होगा तुझे उसकी बेइंतिहा मोहब्बत का...
पर वफ़ा पर कर शक उसकी शिकायत भी रोज़ करेगा तू...
और नहीं करता मोहब्बत आज तो आँसुओं से हरज़ाना न भरता...
समझ जाता प्यार को इतनी आसानी से कोई...
तो मीरा को यूं मूरत में समाना न पड़ता...
अभी उमर ही कितनी हुई है तेरी..,अभी तो बहुत कुछ जानेगा तू...
और नहीं करना इश्क़ दोबारा बार- बार यही ठानेगा तू...
इश्क़ ही ख़ुदा है,रब है,उसकी शकल में भगवान को भी पहचानेगा तू...
मंज़िल भी इश्क़,ज़िन्दगी भी इश्क़ और वक्त आने पर श्मशान भी इसी को मानेगा तू...
देकर अग्नि परीक्षा सीता तुझे इज्ज़त को गंवाना न पड़ता...
और समझ जाता प्यार को इतनी आसानी से कोई...
तो मीरा को यूं मूरत में समाना न पड़ता...
ज़िल्लत भरी ये ज़िन्दगी देखकर तेरी पलकें इतना रो जाएगी...
सूखा समंदर लेकर किसी के जनाज़े पर होगा तू...और आंखें तेरी पत्थर हो जाएगी...
उन्हीं पत्थर आंखों को पिघलाने वो फिर आएगी...
फिर ज़ज्बातों के साथ खिलवाड़ होगा..,उम्मीदें फिर खो जाएगी...
पलकों पर पहले ख़्वाब रखता था..,अब आँसुओं की कुछ बूंदें रखता है कोई...
आजकल दरवाज़े को करके बंद कसके..,घर के बाहर ही नींदे रखता है कोई...
बोलचाल किसी से नहीं है,कोई दोस्त नहीं रखता...
बस कुछ दुश्मन रखता है,पर चुनिन्दे रखता है कोई...
और जो सारे जहान में उड़कर वापिस आ जाते है...
मुझे भी देदो अगर कोई परिंदें रखता है कोई...
तू भी काबिल होता आज,इंसान होता,अगर पागल दिवाना न बनता...
और समझ जाता प्यार को इतनी आसानी से कोई...
तो मीरा को यूं मूरत में समाना न पड़ता...
©harshjain