मित्रता का संगम

सांझ ढले की पहली बूंद,
मित्रता उस मधुवन सी है।
जहाँ हंसी खिलती अनगिनत,
और बातें होती हरदम नई।

वो साथ चलना घनी राहों पर,
सुख-दुख में संग बढ़ना।
जैसे सूरज-चाँद की संगिनी,
एक दूजे का हाथ थाम,
निर्भर, सजीव और अटूट।

मित्रता वो मीठा गान है,
जो कभी न हो पुराना।
इसके बिना जीवन एकांत,
इसके संग जीवन आनंदमय।