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मजदुर

छाले पडे़ हैं पाँव में,रुकना नामंजुर है.. हजारो मील चल चुके,गाँव अभी दुर है.. ये इनके पैर थकते क्युँ नहीं..
जनाब हम मजदुर हैं..!! हमारे हाथों से बना,तुम्हारे इमारतों का रसुख है.. हमने धरती का सीना चीरा,तब मिटी तुम्हारी भुख है..! उधड़े रस्तों को ,हमने किया राजमार्ग है.. तुम्हारे फैक्र्टियों में जो जल रही,हमारे पसीने की आग है! तुम्हारे भट्टियो में,खुद को जलाया हर रोज है.. तब जाकर उतरा,तुम्हारे सर से नकारेपन का बोझ है..! हमारे सिने पे तुमने,अपना लोहा पिघलाया है.. ये रास्ते हमे क्या रोकेंगे, जिसे हमने खुद बनाया है..! तुम समझते हो की,हम तुम्हारे टुकड़ों के मोहताज हैं.. अरे तुम डरे हुए चुजे,हम आसमाँ चीरता बाज हैं..! हमारी तंगहाली में,तुमने अपने हाथ खड़े किए हैं.. बस चंद महीनों मे डर गए.... इसी हाल में हमने,अपने बच्चे बड़े किए है..! तुम्हारे सुनहरे कल को,हमने अपने लकीरों से लिखा है.. अरे तुम हमें क्या दोगे.. तुम्हारे आत्मनिर्भर होने का सपना,हमारे कंधो पर टिका है...! तुम हमें क्या दोगे,हम देते हैं तुम्हें... एक वचन. कि आज जा रहे हैं ,तुम्हारे शहर को करके वीरान हम.. पर लौटेंगें एक दिन.. और कर देंगें हरा, ये पुरा रेगिस्तान हम...!!! :- Nikhil Morya. f. instra:-@morya 672💗
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