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मस्तियां

मेरे भीतर की खामोशी
ये बाहर का कोलाहल
बहुत चाहकर भी
उसे छू न सका
तुमने समझा मैं
डगमगाया हूं
मगर वो राहें जिन्हें
चुन के छोड़ आया था
आज भी
इन्तज़ार करती हैं मेरा।
मेरे मन के गुलमोहर
अब इतने लहलहाते हैं
तुम्हारे कैक्टस
उनके साए में पनाहगार हैं अब🌹
©yogamity