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मटर

हम मटर सरीखे हल्के थे,
अब दिल पत्थर सा भारी है,
हम सपनो के घर बुनते थे,
अब अपना घर भी खाली है,
हम सरपट चलते थे साथ तुम्हारे,
अब एक कदम भी भारी है,
कभी जपते रहते थे नाम तुम्हारा,
अब लब्ज़ पर आना गद्दारी है,
हम मटर सलीके हल्के थे ,
अब दिल पत्थर सा भारी है।
©saurabh15