एक रोज़ मुसाफ़िर गठरी लेकर निकल पड़ा, चेहरे पर मुस्कान, मन में आशाएँ थीं, चलते-चलते कभी दाएँ तो कभी बाएँ मुड़ा। एक रोज..।
शहर-शहर, नगर-नगर, डगर-डगर होते हुए,
दूर से ही मंजिल तक़ मुस्कराते हुए,
वह खुशी से झूमते हुए चल पड़ा। एक रोज़...।
नगर -नगर व्यापार कर,
पेट के लिए जीविका कमाकर,
वह बोझा उठाए चल पड़ा। एक रोज़...।
कहीं मिला खुशियों भरा उजियाला,
कहीं निराशा के काले बादल,
अपने मन का मर्म छुपाए,
वह मुसकुराकर चल पड़ा। एक रोज़...।
कभी मिला भरपेट भोजन,
तो कभी भूखे पेट ही सोना पड़ा,
अब न जाने वह,
किस उलझन में उलझा पड़ा?
एक रोज़ मुसाफ़िर गठरी लेकर निकल पड़ा।।
©mahakaal
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